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भारत का विभाजन तो नेहरू ने ही किया था!

By: Watan Samachar Desk

इलियास आज़मी, पूर्व सांसद (लोक सभा)

मोबाइल नंबर: 09868180355

 

देश की समस्याओं से ध्यान हटाने तथा अपने तुच्छ स्वार्थों की पूर्ति के लिए अंग्रेज़ की वापसी के 70 साल बाद जिन्ना को एक राष्ट्रीय समस्या बना दिया गया है। यदि जिन्ना का चित्र समस्या है, तो हमारे बहादुरों को ए0एम0यू0 से पहले संसद भवन पर हमला करना चाहिये. वह ए0एम0यू0 से कहीं अधिक पवित्र जगह है जहां के पूर्व सांसदों में जिन्ना का चित्र, श्यामा प्रसाद मुखर्जी के साथ लगा है।

 

किसे नहीं पता कि श्यामा प्रसाद मुखर्जी ही जिन्ना के सबसे प्रिय मित्र रहे हैं, जिन्हें जिन्ना ने ही बंगाल की मुस्लिम लीगी सरकार में मंत्री बनाया था। यदि डाॅ0 अम्बेडकर संविधान सभा में न पहुंचते, तो आज का दलित व पिछड़ा कहां होता यह केवल अधिक आयु के लोग ही समझ सकते हैं। यह बात चाहे बहुत कम लोगों को पता हो, परन्तु यह सच्चाई दोपहर के सूरज की भांति चमकीली है कि फरवरी 1946 के चुनाव के समय डाॅ0 अम्बेडकर केन्द्र में मंत्री होने के कारण नहीं लडे हों, न ही किसी भी सदन के सदस्य ही थे।

 

चुनाव के तुरन्त बाद आए कैबनट मिष्न ने कांग्रेस तथा मुस्लिम लीग में समझोता करा दिया था कि देश का विभाजन नहीं हो, बल्कि ऐसी व्यवस्था होगी कि लोक तांत्रिक व्यवस्था में बहुमत अल्पसंख्यक को दबाकर न रख सके। समझौते पर कांग्रेस मुस्लिम लीग तथा अंग्रेजों के हस्ताक्षर हो चुके थे।

 

संविधान सभा गठन इस प्रकार होना था कि लोकसभा तथा राज्यसभा का हर सदस्य उसमें तो था ही राज्यों की विधान सभाओं से विधायकों को को-अप्ट करके रखा गया था। इस का कोई सदस्य अलग से जनता से चुन कर नहीं आया था।
15 अप्रैल, 1946 को राज्य सभा के चुनाव हुए बंगाल में हुसैन शहीद सोहरबदी, की बहुमत की सरकार बनी. राज्य सभा में मुस्लिम लीग के कई सदस्य आनेे थे। यह जिन्नाह ही थे, जिस ने अपनी एक सीट कम करके डाॅ0 अम्बेडकर को राज्य सभा में भेजा जिससे वह संविधान सभा के भी सदस्य हो गए।

 

जिन्नाह का तर्क था कि इतने काबिल आदमी को संविधान सभा में होना ही चाहिये, परन्तु नेहरू इतने चिंतित हो गए कि अम्बेडकर को मुस्लिम लीग द्वारा संविधान सभा में भेजने से कहीं पूरा देश ही पाकिस्तान न बन जाए उसी दिन से नेहरू ने यह कहना आरम्भ कर दिया था कि यह साझा चलने वाला नहीं है।

 

सन 1946 में ही अंग्रेज़ ने केन्द्र और राज्य सरकारों का गठन कराने, संविधान सभा का काम आरम्भ कराने के बाद अपनी वापसी की तिथि 15-08-1947 घोषित कर दी, जो लोग यह कहते हैं कि हम ने अंग्रेज़ को मार भगाया वह सब नेता एक राय होकर अंग्रेज़ पर दबाव बनाते रहे कि वह एक साल बाद की तिथि घोषित करे।

 

 

इसे नेहरू का भाग्य कहा जा सकता है कि अंग्रेज़ ने सत्ता स्थानान्तरण के लिए नपुंसक और जोरू के गुलाम लार्ड माउन्ट बेटन को भारत का अंतिम गर्वनर जनरल बना कर भेजा, लेडी माउन्ट बेटन और नेहरू के सम्बन्धों से सारी दुनिया परिचित है।

 

अबुल कलाम आज़ाद को कांग्रेस अध्यक्ष पद से हटाने के बाद तथा गांधी जी द्वारा सरदार पटेल को अध्यक्ष की दावेदारी से हटाने के बाद नेहरू कांग्रेस अध्यक्ष पहले ही बन चुके थे, उन्होंने सारे प्रदेशों में केवल ब्रह्मण अध्यक्ष नियुक्त कर दिए. इस काम को पूरा करने में उन्होंने साम, दाम, दंड, भेद के सारे ब्रह्म अस्त्रों का प्रयोग किया, परन्तु उनकी मुष्किल वह कैबिनेट मिशन पलान था जिस पर उन्होंने स्वयं हस्ताक्षर किए थे।

 

ब्रह्मण प्रधानमंत्री के साथ सारे राज्यों के मुख्यमंत्री भी ब्रह्मण हो जायें यह तभी सम्भव था जब जब देश के मुस्लिम बहुमत के क्षेत्रों को बाकी देश से काट कर अलगा कर दिया जाये, परन्तु मुस्लिम लीग और जिन्नह कैबिनेट मिशन पलान से संतुष्ट होकर एक साल पहले ही अपनी भारत विभाजन की मांग वापस ले चुके थे और एक भारत के लिए काम कर रहे थे। उसे फिर से विभाजन पर राजी करना असम्भव था।

 

नेहरू ने पंजाब और बंगाल राज्यों जहां मुस्लिम लीग की सरकारें थी, के विभाजन की मांग ज़ोर शोर से रखी, ताकि जिन्ना उत्तेजित होकर फिर से अपनी भारत विभाजन की मांग उठा दें और कांग्रेस तुरन्त मान कर विभाजन के आरोप से बच सके, परन्तु जिन्नाह ने कहा कि 50 प्रतिषत मुस्लिम आबादी वाले आसाम और 98 प्रतिषत मुस्लिम आबादी वाले राज्य सरहद पर कांग्रेस का राज रह सकता, तो यदि बंगाल व पंजाब के कुछ जिलों में हिन्दू बहुमत है, तो उससे क्या फर्क पड़ता है।

 

नेहरू की दूसरी मुश्किल थी कि गांधी जी और सरदार पटेल की सहमति के बिना वह कांग्रेस से भी विभाजन का प्रस्ताव पास नहीं करा सकते थे और समय निककला जा रहा था. 15 अगस्त करीब होती जा रही थी, उतनी ही नेहरू की बेचैनी बढ़ती जा रही थी कि गांधी जी ने सम्प्रदायिक दंगों को रेाकने के लिए बहुत दूर नवा खाली जाकर डेरा डाल दिया। गांधी जी से छुपाकर मिलते नेहरू ने बहुत लम्बी मेहनत और अपनी ब्रह्मण बुद्धि का प्रयोग कर सरदार पटेल को राजी कर लिया।

 

सरदार पटेल ने अपने जीवन की दो बड़ी गलतियां कीं जिस का खामियाज़ा पूरे भारतीय समाज को भुगतना पड़ा. पहले उन्होंने गांधी जी की बात मानकर नेहरू के लिए जगह खाली की. दूसरे नेहरू उन्हें विभाजन पर सहमत करने में सफल हुए।

 

सरदार के राजी होते ही नेहरू ने 27-05-1947 को कांग्रेस वर्किंग कमेटी की मीटिंग बुलाई, गांधी जी नवा खाली से यह कह कर ट्रेन में बैठे कि बटवारा मेरी लाश पर ही हो सकता है, परन्तु नेहरू जी ने उनकी ट्रेन के दिल्ली पहुंचने का इंतेजार भी नहीं किया और भारत माता का काम तमाम कर दिया।

 

सच्चाई तो यह कि नवाखाली से गांधी जी नहीं उनकी जीवित लाश ही दिल्ली पहुंची थी. कांग्रेस कमेटी की बैठक में केवल दो सदस्यों खान अब्दुल गफ्फार खां तथा अबुल कलाम आज़ाद ने विरोधी नोट लिख कर हस्ताक्षर किए थे, नेहरू जी ने लार्ड माउन्ट बेटन को उस की जोरू दारा पहले ही राज़ी कर रखा था. उस ने 03-06-2018 को कांग्रेस प्रस्ताव को स्वीकृत कर भारत विभाजन की घोषणा रेडियो पर कर दी और पंजाब के नक्शे पर लाल लकीर खींचने का काम सर रेड किलिफ के जिम्मे किया।

 

सर रेड किलिफ ने मरने से पहले किताब लिख कर अधिकांश आरेाप माउन्ट बेटन पर लगाए हैं तथा भारतवासियों विशेष तौर पर मुस्लमानों से माफी मांगी है।

मैं अगस्त 1997 में संसद के विशेष स्तर में पूरी कांग्रेस पार्टी को चुनौती देते हुए अपने लम्बे भाषण से जवाहर लाल नेहरू को पाकिस्तान का संस्थापक घोषित कर चुका हॅू. मैं समझता था कि कोई कांग्रेसी तो मेरा जवाब देगा. मैं जानता था कि कांग्रेसी अपनी निन्दा तो बरदाशत कर सकता, परन्तु नेहरू परिवार पर टिप्पणी कभी बरदाशत नहीं कर सकता, परन्तु कांग्रेस इसे शरबते रूह अफज़ा की भांति पी गई।

मुझसे आदरणीय जसवन्त सिंह ने कहा था कि लगता है कि आप की बातें ते पूर्ण सत्य हैं। इसी लिए कांग्रेस उसे पी गई जवाब देने पर बहस छिड़ जाने का उन्हें डर होगा। हर भारतीय को यह सोचना चाहिये कि जो विभाजन कांग्रेस के प्रस्ताव पर हुआ कोई दूसरा उस का जिम्मेदार कैसे हो सकता है।

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं. इस आलेख में दी गई किसी भी सूचना की सटीकता, संपूर्णता, व्यावहारिकता अथवा सच्चाई के प्रति वतन समाचार उत्तरदायी नहीं है. इस आलेख में सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं. इस आलेख में दी गई कोई भी सूचना अथवा तथ्य अथवा व्यक्त किए गए विचार वतन समाचार के नहीं हैं, तथा वतन समाचार उनके लिए किसी भी प्रकार से उत्तरदायी नहीं है.

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