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निरंकुशता, निर्ममता और बर्बरता की कोख से जन्मा है नीतीश-मोदी राज: INC

जब सारी संवेदनाएं दम तोड़ देती हैं, जब सारी उम्मीदें साथ छोड़ देती हैं, जब मेहनतकश मजदूरों से जिंदगी मुंह मोड़ लेती है, तब जो निरंकुशता, निर्ममता और बर्बरता की कोख से जन्म लेता है, वही कहलाता है नीतीश-मोदी राज। जब इतिहास लिखा जाएगा तो कहा जाएगा कि 21 वीं सदी के भारत में दो ऐसे तानाशाह हुए थे जिन्होंने देश और बिहार के मेहनतकश मजदूर भाईयों पर रोंगटे खड़े कर देने वाला बर्बर व्यवहार किया था।

By: Press Release
  • निरंकुशता, निर्ममता और बर्बरता की कोख से जन्मा है नीतीश-मोदी राज 
  • बिहार के मजदूरों की बेबसी, लाचारी और दर-बदर की ठोकरें खाने की कहानी

 


जब सारी संवेदनाएं दम तोड़ देती हैं, जब सारी उम्मीदें साथ छोड़ देती हैं, जब मेहनतकश मजदूरों से जिंदगी मुंह मोड़ लेती है, तब जो निरंकुशता, निर्ममता और बर्बरता की कोख से जन्म लेता है, वही कहलाता है नीतीश-मोदी राज। जब इतिहास लिखा जाएगा तो कहा जाएगा कि 21 वीं सदी के भारत में दो ऐसे तानाशाह हुए थे जिन्होंने देश और बिहार के मेहनतकश मजदूर भाईयों पर रोंगटे खड़े कर देने वाला बर्बर व्यवहार किया था।

आइये, सिलसिलेवार जानते हैं बिहार के मेहनतकश मजदूरों के साथ हुए दुर्व्यवहार की व्यथाः

1. नीतीश की नाकारा सत्ता और पलायन को मजबूर मजदूर

बिहार में नीतीश-भाजपा के 15 साल के कुशासन का यह हाल था कि यहां न उद्योग लगाए गए, न रोजगार के अवसर सृजित किए गए, न किसानों को फसलों के दाम दिए गए। नतीजा यह हुआ कि बिहार में 4 करोड़ 21 लाख लोग गरीबी रेखा से नीचे रहने को मजबूर हुए। मजबूरी में काम की तलाश में बिहार से पलायन करके दूसरे प्रांतों में जाना पड़ा। हाल ही में फरवरी 2020 में इंस्टीट्यूट ऑफ पॉपुलेशन साइंस की रिपोर्ट में खुलासा हुआ कि बिहार की 50 प्रतिशत परिवारों के लोग बिहार से दूसरे प्रांतों में पलायन के लिए मजबूर हुए हैं। इसमें भी अधिसंख्य लोग बिहार के सीमांचल इलाके से हैं। सर्वाधिक पलायन पूर्णिया, दरभंगा, कोसी, मुंगेर, तिरहट, सारण इलाके के हैं। इनमें भी पिछड़े वर्ग के, अनुसूचित जाति वर्ग के लोग सर्वाधिक हैं।

इस अध्ययन में पाया गया कि पलायन करने वाले 80 प्रतिशत लोग भूमिहीन हैं और इनमें से 85 प्रतिशत लोग 10 वीं पास हैं। ये मजदूर अपना पेट काटकर औसत 26,020 रु. सालाना बिहार में परिवारों को भी भरण-पोषण के लिए भेजते हैं। वेदना यह है कि ये मजदूर न अपने बच्चों को पर्याप्त शिक्षा दे पाते हैं, न ही पोषण।

2. नीतीश-मोदी राज अमीरों पर करम, मजदूरों के लिए बेरहम

एक तरफ केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार ने देश के मजदूरों पर जितना कहर ढाया है तो दूसरी ओर देश के अति अमीर परिवारों पर असीम कृपा की है। पूरा विश्व महामारी की विभीषिका से जूझ रहा था तब मोदी सरकार ने 24 मार्च को लॉकडाउन की घोषणा के पहले नियोजित रूप से देश के मुट्ठीभर अति अमीर परिवारों को इस बात की सूचना पहले से दे दी थी और 8 मार्च से 21 मार्च के बीच 102 प्राइवेट फाल्कन 2000 जैसे चार्टर विमानों से अमीरों के बच्चों को विदेश से बुला लिया। जो कि विश्व के फ्रांस, जर्मनी, स्वीजरलैंड, यूके जैसे विश्वविद्यालयों में पढ़ रहे थे। फिर 21 मार्च को विदेश से आने वाली हवाई सेवाओं पर रोक लगाई।

3. मजदूरों से सड़कों पर बर्बरता का तांडव

रातों-रात मोदी सरकार ने अचानक देश बंदी की घोषणा कर दी। बिहार के मजदूर जो देश के दूसरे प्रांतों में काम कर रहे थे, उनमें न सिर्फ भय व्याप्त हो गया अपितु उनके पास खाने के साधन तक नहीं थे। बेबस और लाचार मजदूर भूखे-प्यासे पैरों में छाले लिए पीठ पर अपने बच्चों को लादे हजारों किमी. का पैदल सफर तय करने के लिए बिहार की ओर कूच कर गए। न सिर्फ मजदूरों को सड़कों पर बर्बरता से मारा गया अपितु एक एनजीओ सेव लाइफ फाउंडेशन की रिपोर्ट से खुलासा हुआ कि 24 मार्च से 18 मई के बीच देश की सड़कों पर 159 प्रवासी श्रमिकों ने दुर्घटना और भूख-प्यास से अपना दम तोड़ दिया और 630 प्रवासी गंभीर रूप से घायल हुए। पूरे देश ने मजदूरों को ट्रेन से कटते हुए देखा, ट्रक दुर्घटना में मौत होती हुई देखी।

बिहार की एक मासूम बेटी तो 1,200 किमी. साइकिल चलाकर अपने पिता को घर लेकर आई। तो वहीं, समस्तीपुर रेलवे स्टेशन पर एक अबोध बालक अपनी मृत मां के पास भूख-प्यास से बिलखता दिखा। मानवता को शर्मशार कर देने वाले यह दृश्य देखने के बाद भी नीतीश की निरंकुश सत्ता का दिल नहीं पसीजा।

4. यूनिसेफ और डेवेलपमेंट मैंनेजमेंट इंस्टीट्यूट की रिपोर्ट का खुलासा

अगस्त 2020 में यूनिसेफ और डीएमआई की रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि आज भी बिहार के 51 प्रतिशत प्रवासी मजदूर परिवारों की आय लॉकडाउन की वजह से पूरी तरह खत्म हो गई है और 30 प्रतिशत परिवारों की आय में बहुत बड़ी कमी आई है। लॉकडाउन के बाद लगभग 40 लाख मजदूर बिहार वापस आए हैं। इस रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि इनमें से 48 प्रतिशत परिवारों को सार्वजनिक वितरण प्रणाली के तहत पर्याप्त राशन भी नहीं मिला है। इन प्रवासी मजदूर परिवारों में 29 प्रतिशत ओबीसी हैं, 23 प्रतिशत ईबीसी हैं, 20 प्रतिशत शिड्यूल कास्ट हैं, 3 प्रतिशत शिड्यूल ट्राइब्स हैं।

5. मनरेगा में भी काम नहीं

मोदी सरकार के मुताबिक बड़े राज्यों में मनरेगा मजदूरों को काम की मांग के बावजूद सबसे कम काम देने वाला राज्य बिहार है। मनरेगा पोर्टल के 22 अक्टूबर के आंकड़ों के अनुसार मनरेगा में 100 दिन की अपेक्षा औसत 34 दिन का काम दिया गया तथा 40,53,883 मनरेगा मजदूरों को काम मांगने पर भी नहीं दिया गया।

6. नीतीश की निर्दयी सत्ता ने मजदूरों को बिहार की सीमा में घुसने से रोका

जब सैकड़ों किमी. दर-बदर की ठोकरें खाकर मजदूर बिहार पहुंच रहे थे तब नीतीश कुमार ने रातों-रात यह फरमान जारी कर दिया कि  मैं इन मजदूरों को बिहार की सीमा में घुसने नहीं दूंगा। बिहार की सीमा पर आए मजदूरों को बर्बरता से लाठी और डंडों से पीटा गया। इतना ही नहीं, बिहार के जो छात्र दूसरे प्रांतों में पढ़ रहे थे, उनके आने पर भी सुशील मोदी ने रोक लगा दी। जबकि भाजपा के नवादा के विधायक को कोटा में पढ़ रहे अपने बच्चे को वहां से लाने की अनुमति दे दी।

7. क्वैरेंटाईन सेंटर में मजदूरों से जानवरों जैसा व्यवहार

जब दूसरे प्रांतों से मजदूर भाई बिहार में आए तो नीतीश सरकार ने फरमान सुनाया कि उन्हें 21 दिनों तक क्वेरेंटीन सेंटर में रहना होगा। सीमांचल सहित समूचे प्रदेश में 2500 क्वेरेंटीन सेंटर बनाए गए। मजदूरों ने अपनी व्यथा व्यक्त करते हुए बताया कि हमारे साथ यहां जानवरों जैसा व्यवहार किया जा रहा है। सिर्फ थोड़ा सा अनाज उलाबकर दे दिया जाता है। पीने के लिए पानी की व्यवस्था नहीं है। सोने के लिए बिस्तर नहीं है। कुछ जगह बहुत गंदे शौचालय हैं तो कहीं शौचालय की व्यवस्था नहीं है।

जब पूर्णिया, अररिया, किशनगंज सहित कोसी और सीमांचल क्षेत्र के लगभग एक दर्जन जिलों के मजदूर घबड़ाकर क्वेरेंटीन सेंटर छोड़कर चले गए तो उन्हें नीतीश की पुलिस बर्बरता से पीटते हुए फिर उन केंद्रों पर ले आई।

अब समय आ गया है कि नीतीश-भाजपा की निर्मम और बर्बर सत्ता को सीमांचल के मेहनतकश मजदूर उखाड़ फेकेंगे।

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