फिर मचेगा हाहाकार तब जागेंगे मोदी और केजरीवाल

इंडियन एग्रीकल्चरल रिसर्च इंस्टीट्यूट (IARI) के एक दशक पहले दिए आंकड़ों के मुताबिक देश की राजधानी दिल्ली का वातावरण पराली जलाने से लगभग 150 मिलियन टन कार्बन डाइऑक्साइड, 9 मिलियन टन कार्बन मोनोऑक्साइड व 0.25 मिलियन टन बेहद जहरीली ऑक्साइड ऑफ सल्फर से भर जाती है.

By: Watan Samachar Desk

दिल्ली-एनसीआर पर प्रदूषण का हवाई हमला शुरू हो चुका है. पंजाब, हरियाणा, राजस्थान और उत्तर प्रदेश में खरीफ की कटाई कर रहे किसानों ने अगली फसल की तैयारी के लिए एक बार फिर पराली (फसल की खूंट) जलाना शुरू कर दिया है.

 

आज तक के अनुसार पिछले साल 2017 की दीपावली में जब राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में सुप्रीम कोर्ट की पहल के बाद केन्द्र सरकार ने पटाखों के इस्तेमाल पर प्रतिबंध लगा दिया था उस समय पटाखे नहीं फोड़े गए लेकिन इसके बावजूद राष्ट्रीय राजधानी और आसपास के राज्यों को प्रदूषण के प्रकोप से नहीं बचाया जा सका. असली विलेन पटाखे नहीं बल्कि पंजाब, हरियाणा, राजस्थान और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के खेतों में जलाई जाने वाली पराली है.

 

इंडियन एग्रीकल्चरल रिसर्च इंस्टीट्यूट (IARI) के एक दशक पहले दिए आंकड़ों के मुताबिक देश की राजधानी दिल्ली का वातावरण पराली जलाने से लगभग 150 मिलियन टन कार्बन डाइऑक्साइड, 9 मिलियन टन कार्बन मोनोऑक्साइड व 0.25 मिलियन टन बेहद जहरीली ऑक्साइड ऑफ सल्फर से भर जाती है.

 

 IARI का दावा है कि दिल्ली में प्रदूषण के अन्य स्रोत जैसे गाड़ियां, फैक्ट्रियां और कूड़ा जलाने से लगभग 17 गुना अधिक प्रदूषण महज अक्टूबर-नवंबर के दौरान उत्तर भारत में पराली जलाने से होता है. पराली जलाने की परंपरा भारत में नई नहीं है. एग्रीकल्चर रिसर्च इंस्टीट्यूट द्वारा 2014 में एकत्र किए गए आंकड़ों के मुताबिक 2008-09 के दौरान देश में फसल की कटाई के बाद लगभग 620 मिलियन टन पराली खेतों में बची.

 

 इसमें से लगभग 16 फीसदी पराली को खेतों में जला दिया गया जिसमें लगभग 60 फीसदी पराली धान की थी और महज 22 फीसदी पराली गेहूं की थी. कृषि विभाग के अनुमान के मुताबिक अकेले पंजाब में 20 मिलियन टन धान और 20 मिलियन टन गेहूं की पराली खेतों में बच रही है.

 

 उत्तर भारत में किसानों के पास महज 15 से 20 दिन का समय रहता है. जहां एक तरफ इस समय में उसे त्योहार भी मनाना है, उसे अगली बुआई के लिए खेत को तैयार भी करना है. ऐसे में कृषि जानकारों का दावा है कि इन राज्यों में लगभग 80 फीसदी किसान अपने खेत में पड़ी पराली को जला देते हैं.

 

कुछ समय पहले देश के जाने-माने हॉर्ट सर्जन डॉ नरेश त्रेहन ने इंडिया टुडे को बताया था कि दिल्ली एनसीआर में होने वाला पॉल्यूशन आदमी के फेफड़ों पर बुरा असर डाल रहा है. यह स्थापित करने के लिए डॉ त्रेहन ने नई दिल्ली में एक आदमी के फेफड़ों की तुलना हिमाचल प्रदेश में रहने वाले एक अन्य आदमी के फेफड़ों से की थी.

 

नीति आयोग ने 2017 में केन्द्र सरकार को प्रदूषण के इस कारण को रोकने के लिए 600 मिलियन डॉलर (3,200 करोड़ रुपये) खर्च करने का सुझाव दिया था. इस सुझाव के बाद केन्द्र सरकार ने प्रति वर्ष 230 मिलियन डॉलर (1,700 करोड़ रुपये) खर्च कर किसानों को पराली जलाने से रोकने का प्रस्ताव तैयार किया.

 

 केन्द्र सरकार के प्रस्ताव के तहत वह दिल्ली से सटे तीन राज्य पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश में किसानों को ऐसी मशीनें खरीदने में मदद करेगी जिससे किसानों को पराली जलाने से रोका जा सके. लेकिन पिछले साल तैयार हुए इस प्लान पर सरकार असमंजस में है और एक बार फिर इन राज्यों में पराली जलाने की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है और सरकार की स्कीम फाइलों में बंद पड़ी है.

 

इस योजना के मुताबिक केन्द्र सरकार दो साल में 3,200 करोड़ रुपये खर्च कर पराली की समस्या पर पूरी तरह से काबू पा सकती हैं. गौरतलब है कि खेतों में पराली जलाना गैरकानूनी है और बीते कई वर्षों से राज्य सरकारें इस कानून को प्रभावी करने की कोशिशों में जुटी हैं. इसके बावजूद पराली संकट से साल दर साल राजधानी दिल्ली और आसपास के इलाकों में प्रदूषण का स्तर खराब हो रहा है.

 

एक तरफ डॉ नरेश त्रेहन द्वारा की गई शोध इस समस्या का गंभीर असर राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में रह रहे लोगों पर दिखा रही है. एक अन्य रिपोर्ट का दावा है कि पराली जलाने से पंजाब के किसानों को प्रतिवर्ष 800 से 2000 करोड़ रुपये का न्यूट्रीश्नल लॉस और 500 से 1,500 करोड़ रुपये का नुकसान नाइट्रोजन, फॉस्फोरस और पोटाश फर्टिलाइजर पर खर्च के जरिए हो रहा है.

You May Also Like

Notify me when new comments are added.

धर्म

ब्लॉग

अपनी बात

Poll

Should the visiting hours be shifted from the existing 10:00 am - 11:00 am to 3:00 pm - 4:00 pm on all working days?

SUBSCRIBE LATEST NEWS VIA EMAIL

Enter your email address to subscribe and receive notifications of latest News by email.